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भिखारियों हर दिन कि लिए अलग होता है ड्रेस कोड, भीख कैसे मांगें इसके लिए दी जाती है ट्रेनिंग

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यूपी लखनऊ जी हां, भिखारियों की दुनिया पूरी तरह से बदल गई है। इसके लिए उन्हें कॉरपोरेट स्टाइल में प्रशिक्षण दिया जाता है। इस प्रशिक्षण में पर्सनालिटी डेवलपमेंट जैसी पूरी प्रक्रिया अपनाई जाती है। मसलन-क्या पहनें, कैसे बोलें, कैसे चलें…। चौंक गए न? चलिए फिर यह भी जान लीजिए भिखारियों की हर बस्ती में ऐसी पर्सनालिटी ग्रूमिंग की क्लास लगती है। इस क्लास से टिप्स सीखने के बाद ही बैच बाजार में आता है।

भिखारियों का प्रशिक्षण कैसे होता है, इस सवाल को लेकर हम शहर के दुबग्गा इलाके में पहुंचे। शरीर से हट्टा-कट्टा मकरंद साधु वेश में भीख मांग रहा था। जैसे ही हमने कहा भीख मांगते शर्म नहीं आती उसने तपाक से कहा फिर और क्या करें? काम करोगे?…ये सवाल सुनते ही वह बोल पड़ा-हमारी तो पूरी जिंदगी ऐसे ही कट गई…अब क्या करेंगे। बच्चों की तो शर्म करो…ये वाक्य सुनते ही वह कुछ ढीला पड़ा। बोल पड़ा-साहब क्या करें? फिर हमें हिकारत भरी नजरों से देखते हुए बोल पड़ा-बाबूजी आसान नहीं भीख मांगना। ऐसे किसी से मांगों तो कोई देगा…। नहीं…ना। बच्चे अच्छा कमा लेते हैं। पर, बच्चे बड़ों को पैसा देने पर मजबूर कर दें, इसके लिए उन्हें तैयार करना पड़ता है।

दुबग्गा से निकलकर हम हनुमान सेतु जा पहुंचे। यहां मंदिर के दाहिनी तरफ पार्किंग में हमें भगत मिला। नशे में धुत। वह मांगने के लिए हाथ बढ़ाता है पर जुबान साथ नहीं देती। हमने हिकारत से कहा- शर्म नहीं आती, भीख मांगकर शराब पीते हो। वह बोला तो बेसाख्ता बोलते ही गया। साहब, क्या करें आदत छूटती नहीं। हमारे यहां बस्ती में तो सभी नशा करते हैं। सभी…? औरतें, बच्चे, बूढ़े सब…। लाचार दिखने के लिए ये सब जरूरी है। इसलिए सबको सिखाया जाता है। कहां से लाते हो? साहब, बस्ती में ही कच्ची शराब मिल जाती है। जो कुछ काम नहीं कर पाते वे शराब ही बनाते हैं। कब से पी रहे हो? साहब ये तो याद नहीं… कोई बीस बरस तो हो ही गए होंगे।

लंगड़ बाबा सोमवार को मनकामेश्वर धाम, मंगलवार को हनुमानसेतु, गुरुवार को खम्मन पीर बाबा की मजार तो शनिवार को कपूरथला के शनि मंदिर के सामने बैठते हैं। मंगलवार को वह गेरुआ रंग का तो शनिवार को काला, गुरुवार को हरे कपड़े ही पहनते हैं। अलग-अलग दिन अलग-अलग रंग के कपड़े का क्या असर होता है, इस सवाल पर वह कहते हैं धार्मिक स्थलों के आसपास अगर अच्छे कपड़े और वहां के हिसाब के रंग के कपड़े पहने तो अच्छा पैसा मिलता है। बिना मांगे भी मिल जाता है। नहीं तो लोग भिखारी समझकर भगा देते हैं।

बच्चों को लेकर भीख मांगती महिलाएं अक्सर दिखती हैं। क्या ये बच्चे उनके खुद के होते हैं, या फिर कुछ और…। इस सवाल का जवाब जानना बेहद कठिन है। पर, भगत के पास लाठी लेकर खड़ी महिला सावित्री बोल पड़ी। साहब, का करें हमार सबके एही धंधा है। पहिले हमहूं बच्चा लइके भीख मांगत रहे…अब इहां पंगत लगवाइत हन…। बच्चा लइके…? आपन…? सवाल जिस तेजी से उछले उसे संभलने का मौका नहीं मिला और बोल पड़ी-नाहीं। तब किसका? अरे, कहूं भी सड़क पे बच्चा मिलि जात है तउ ओका हम सब पालित हन। वह बताती हैं कि हर टोली की निगरानी होती है। ट्राईसाइकिल पर बैठकर भीख मांगने वाले सतीश ने बताया कि दिव्यांग बनकर अच्छी भीख मिल जाती है। मजबूरी में ऐसा करता हूं।

भिखारी अतर सिंह की भी ऐसी ही कहानी है। चिनहट के बलरामनगर बस्ती में रहते हैं। बोल और सुन नहीं पाने की वह ऐसी ऐक्टिंग करते हैं कि यकीन ही नहीं होता कि वह सही सलामत है। कुरेदने पर अतर बोल पड़ा-उहईं हमरी बस्ती मा बुढ़ऊ दादा ई सब सिखाए रहेन। इहै करत जिनगी बीति गइ। उसकी बातचीत से पता चला कि बस्ती का ये दादा भिखारियों को गूंगा, बहरा और लंगड़ा बनने की ट्रेनिंग देता है।

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